कुरुद में हर्षोल्लास के साथ मना पोला पर्व
कुरुद (छत्तीसगढ़ दर्पण)। छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा पर्व पोला कुरुद सहित अंचल में धूमधाम से मनाया गया। लोक संस्कृति के इस महाउत्सव में दिन.भर हर्सोल्लास कावातावरण बना रहा। घरों में विधिवत मिट्टी के बैलों व खिलौनों को सजाकर उसकी पूरी सादगी के साथ पूजा अर्चना कर चीला रोटी व प्रसाद का भोग लगाया गया। तदुपरांत छोटे-छोटे बच्चों ने मिट्टी के नांदिया बैल की जोडिय़ों को दौड़ाते हुए पर्व का उल्लास बिखेरा। इसी तरह पशुधनो की पूजा अर्चना की गई व उन्हे आस्था व भक्ति के साथ जनकल्याण की कामना की अर्जी लगाई गई। बैलों को आकर्षक ढंग से सजाकर पर्व की रौनकता में चार-चांद लगाया गया।
सर्वविदित है कि पोला-पिठोरा मूलतखेती-किसानी से जुड़ा त्योहार है। भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को यह पर्व विशेषकर छत्तीसगढ़ में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। पोला त्योहार मनाने के पीछे यह कहावत है कि अगस्त माह में खेती.किसानी काम समाप्त होने के बाद इसी दिन अन्नमाता गर्भ धारण करती है यानी धान के पौधों में इस दिन दूध भरता है, इसीलिए यह त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार पुरुषों, स्त्रियों व बच्चों के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। इस दिन पशुधन बैलों को सजाकर उनकी पूजा करते हैं। स्त्रियां इस त्योहार के वक्त अपने मायके जाती हैं। छोटे बच्चे मिट्टी के बैलों की पूजा करते हैं। पोला पर्व पर शहर से लेकर गांव तक धूम रही। गांव के किसान भाई सुबह से ही बैलों को नहला-धुलाकर सजाते हैं फिर हर घर में उनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद घरों में बने पकवान भी बैलों को खिलाए जाते हैं। बैल किसानों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। किसान बैलों को देवतुल्य मानकर उसकी पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन मिट्टी और लकड़ी से बने बैल चलाने की भी परंपरा है।

