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'पिच ब्लैक' में शामिल होने ऑस्ट्रेलिया पहुंचा भारतीय वायुसेना का दल, बढ़ी चीन की टेंशन...

 डार्विन/नई दिल्ली (छत्तीसगढ़ दर्पण)। एलएसी में भारत-चीन के बीच तनातनी के दौरान भारतीय वायुसेना के एक दल ऑस्ट्रेलिया में होने वाले द्विवार्षिक वायुसैनिक अभ्यास पिच ब्लैक 2022 में हिस्सा लेने के लिए अपने सुखोई लड़ाकू विमानों के साथ डार्विन पहुंच गया है। भारत के इस सैन्य अभ्यास में शामिल होने से चीन की टेंशन बढ़ गई है।

क्वाड देशों के बीच कूटनीति-रणनीतिक रिश्तों के साथ बढ़ते सैन्य सहयोग के तहत भारतीय वायुसेना ऑस्ट्रेलिया में होने वाले द्विवार्षिक वायुसैनिक अभ्यास पिच ब्लैक 2022 में हिस्सा लेने के लिए अपने सुखोई लड़ाकू विमानों के साथ डार्विन पहुंच गई है। रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स की ओर से आयोजित 16 देशों के इस वायुसेना अभ्यास में मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया ही नहीं क्‍वाड के चारों देश मेजबान ऑस्ट्रेलिया, भारत, अमेरिका और जापान की वायुसेनाएं हिस्सा ले रही हैं। एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के बीच मजबूत होते रिश्ते जाहिर तौर पर चीन को असहज करते हैं।

खास बात यह है कि इस अभ्यास में इनके साथ ही जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे यूरोप के प्रमुख देश भी शिकरत कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के शहर डार्विन में 19 अगस्त से आठ सितंबर 22 तक पिच ब्लैक अभ्यास का आयोजन किया जा रहा है। यह वायुसेना अभ्यास लार्ज फोर्स एम्प्लॉयमेंट वारफेयर पर केंद्रित होगा। चार साल बाद हो रहे इस अभ्यास का पिछला संस्करण 2018 में आयोजित हुआ था और कोविड के कारण 2020 में इसका आयोजन रद हो गया था। इस वर्ष के अभ्यास में इन तमाम देशों की वायु सेनाओं के 100 से अधिक विमान और 2500 वायुसैनिक कर्मी हिस्सा ले रहे हैं।

वायुसेनाओं की लड़ाकू क्षमता बढ़ेगी
ग्रुप कैप्टन वाईपीएस नेगी के नेतृत्व में भारतीय वायुसेना की टुकड़ी में 100 से अधिक वायु योद्धा अभ्यास में शामिल होने के लिए ऑस्टेलिया पहुंच गया है। भारतीय वायुसेना के चार सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान और दो सी-17 विमान इस अभ्यास में हिस्सा लेंगे और इस दौरान जटिल वातावरण में बहु-डोमेन हवाई युद्ध मिशन करेंगे। अभ्यास के दौरान भाग लेने वाली अन्य वायु सेनाओं के साथ सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान भी होगा। इस वर्ष, भाग लेने वाले कई देशों के बीच हवा से हवा में ईंधन भरने की क्षमता को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण सहयोग भी किए जाएंगे और इससे वायुसेनाओं की लड़ाकू क्षमता बढ़ती है।

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