पर्युषण पर्व संयम के अंदर की निर्मलता के दर्शन कराता है : प्रवीण ऋषि
संसार में कई उत्सव हैं, लेकिन जो उत्सव हमें परमात्मा से जोड़ता है, वह उत्सव है पर्युषण। जिस तप से सबकी आराधना हो जाये वह पर्युषण है। जिस उत्सव से व्यक्ति समाज से जुड़ जाए, उसे पर्युषण कहते हैं। उक्त बातें टैगोर नगर के लालगंगा पटवा भवन में चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान जैन संत प्रवीण ऋषि के कहीं। उन्होंने कहा कि पर्युषण पदार्थ नहीं प्रभु से जुड़ने का उत्सव है। संसार में जितने उत्सव मनाये जाते हैं वे सभी असंयम को उत्साह देने वाले हैं। पर्युषण पर्व संयम के अंदर की निर्मलता के दर्शन कराता है, महापुरुषों के जीवन से हमें जोड़ता है।
चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में रविवार को आचार्य प्रवर ने महावीर कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि विश्वभूति के जीवन में शांति का अनुभव नहीं था। उन्होंने सोचा कि सभी मेरा आदेश मानते हैं, लेकिन मैं खुद अपना आदेश नहीं मानता हूँ। जैसे स्वयं को चाहते थे वैसे नहीं चला सकते थे। आचार्य प्रवीण ऋषि ने कहा कि विश्वभूति सोच रहे थे कि दूसरे मेरी बात मानते हैं, लेकिन मैं क्यों अपनी बात नहीं मानता हूँ। उनके अंतर्मन में द्वन्द चल रहा था, एक भूकंप सा आया था। आचार्य ने कहा कि भूकंप आने से जमीन और जमीर का नक्शा बदल जाता है। भूकंप बाहर के हमले से नहीं धरती के अंदर हुए हमले से आते हैं। ऐसा ही विश्वभूति के साथ हुआ। फिर वह चल पड़े, जैसे कोई जख्मी शेर चल पड़ा हो। पिता ने रोकने की कोशिश की, नहीं रुके। रानी की आंखों से आंसू बाह रहे हैं, फिर भी नहीं रुके। और उन्हें रोकने की किसी में हिम्मत नहीं थी। वे बाहर निकले, सामने से संभूति आ रहे थे। विश्वभूति को देख संभूति को लगा मानों साक्षात महावीर चले आ रहे हों। उनके चेहरे पर संवेदना और आँखों में ज्वाला थी। संभूति ने आवाज दी, बंधु कहां जा रहे हो, लेकिन विश्वभूति को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। संभूति ने उनका हाथ पकड़ लिया। विश्वभूति ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की लेकिन संभूति ने नहीं छोड़ा। प्रभु का हाथ को छोड़ सकता है भला। विश्वभूति मुड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन फिर भी मुड़ गए। वहीं विश्वभूति को देककर लोगों को आश्चर्य हुआ कि लोगों के दुःख दूर करने वाला आज दुखी है, जो हमेशा दोस्तों के साथ रहता था, आज अकेला है? संभूति को देख विश्वभूति की आँखों में आंसू आ गए। संत प्रवर ने कहा कि जो किसी का दुःख महसूस कर सकता है वह संत होता है।

