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अनुवाद के लिए समाज, संस्‍कृति, समय का परिचय आवश्‍यक : प्रो. रजनीश शुक्‍ल

 वर्धा (छत्तीसगढ़ दर्पण)। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने कहा कि अनुवाद के लिए समाज, संस्‍कृति और समय का परिचय आवश्‍यक है। भारत के लोगों को भारत से परिचित कराने के लिए भारतीय भाषाओं में अधिक से अधिक अनुवाद की जरूरत है।  प्रो. शुक्‍ल भारतीय अनुवाद संघ द्वारा विश्‍वविद्यालय के तुलसी भवन स्थित महादेवी सभागार  में 12 दिसंबर को ‘भारतीय भाषाओं में परस्‍पर अनुवाद’ विषय पर सम्मिश्र पद्धति से आयोजित वेबसंगोष्ठी में बतौर अध्‍यक्ष के रूप में संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्‍दावली आयोग, नई दिल्‍ली के अध्‍यक्ष प्रो. गिरीश नाथ झा तथा मुंबई विश्‍वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व आचार्य एवं अध्‍यक्ष डॉ. रामजी तिवारी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे।


कुलपति प्रो. शुक्‍ल ने कहा कि भारत में सृजित भाषाओं में अनुवाद की कमी है। पूर्वोत्‍तर का साहित्‍य हो या तमिल भाषाओं का, उनका अनुवाद नहीं होने के कारण उसका परिचय अन्‍य भाषा-भाषी लोगों को नहीं हो सका है। आज़ाद भारत को श्रेष्‍ठ भारत बनाने की दृष्टि से अनुवाद एक अच्‍छा उपकरण साबित‍ हो सकता है। हमें भाषिक स्‍वराज्‍य के लिए सभी भारतीय भाषाओं के परस्‍पर अनुवाद की अत्‍यंत आवश्यकता है। उन्‍होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण, नारायण गुरु और डॉ. अंबेडकर आदि के द्वारा किये गये सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक जागरण का परिचय समस्‍त भारतीय नागरिकों को  कराने की दृष्टि से उनके कार्यों तथा साहित्‍य का अनुवाद करना जरूरी है। यदि हम विपुल ज्ञान सामग्री को एकत्र करेंगे तो भारत ज्ञान का केंद्र बन सकता है। हमें भारत को एक ताकतवर राष्‍ट्र बनाना है तो इसके लिए अनुवाद ही एक रास्‍ता है।  कुलपति  प्रो. शुक्‍ल ने अनुवाद की चुनौतियां और रोज़गार के लिए अनुवाद की आवश्‍यकता की चर्चा करते हुए सुब्रमण्‍यम भारती, अभिनव गुप्‍त, माखनलाल चतुर्वेदी और बंकिम चंद्र चटर्जी के साहित्‍य को अनुवादित करने पर बल दिया। उन्‍होंने कहा कि राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत भारतीय भाषाओं के विकास पर अधिक ध्‍यान दिया गया है। यही कारण है कि 11 भारतीय भाषाओं में इंजीनियरिंग की पढ़ाई प्रारंभ भी हुई है। अनुवाद में मशीन अनुवाद के फायदे तो हुए हैं लेकिन अनुवाद के लिए विवेक की जरूरत होती है।  हमें जुझारू होकर अनुवाद की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

 
 

प्रो. गिरीश नाथ झा ने शिक्षा, तकनीकी और अनुवाद विषय पर अपना सारगर्भित वक्‍तव्‍य पीपीटी के माध्‍यम से प्रस्‍तुत किया।  डॉ. रामजी तिवारी ने अनुवाद के कारण हम दुनिया के ज्ञान से परिचित हो सकते हैं। स्रोत भाषा और लक्ष्‍य भाषा का अच्‍छा ज्ञान होना अनुवाद की पहली शर्त होती है। अच्‍छा और प्रभावी अनुवाद तभी हो सकता है जब विभिन्‍न भाषा-भाषी संस्‍कृति का ज्ञान हो। उन्‍होंने संस्‍कृत को केंद्र में रखकर किये गये अनुवाद का जिक्र करते हुए कहा कि अनुवाद एक विज्ञान और कला भी है। दोनों के सामंजस्‍य तथा भाषिक विशेषताओं की जानकारी से अच्‍छा अनुवाद हो सकता है। उनका कहना था कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अनुवाद की संभावना सबसे अधिक हिंदी भाषा में है। यह रोज़गार सृजन और स्‍वावलंबी बनने का भी अच्‍छा साधन बन रहा है। अनुवादक के लिए दो भाषाओं पर अच्‍छा अधिकार होना चाहिए।

 

भारतीय अनुवाद संघ के संयोजक, प्रतिकुलपति प्रो. हनुमानप्रसाद शुक्‍ल ने कार्यक्रम की प्रस्‍तावना में कहा कि राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आने के आने के सा‍थ ही भारतीय अनुवाद संघ प्रासंगिक हुआ है। अनुवाद के कारण भारतीय भाषाओं में उच्‍च शिक्षा प्रदान करने की दिशा में हम आगे बढ़े हैं और विश्‍वविद्यालय में विधि की शिक्षा हिंदी में प्रारंभ हुई है। अन्‍य पांच भारतीय भाषाओं में विधि शिक्षा आरंभ होगी। भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद की अपार संभावनाओं की चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा कि संस्‍कृत का भारतीय भाषाओं के साथ गहरा संबंध है, इसे सेतु भाषा के रूप में देखा जा सकता है।

 

स्‍वागत वक्‍तव्‍य अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. कृष्‍ण कुमार सिंह ने दिया। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप-दीपन, सरस्‍वती के छायाचित्र पर पुष्‍पां‍जलि अर्पण कर तथा कुलगीत से किया गया। चंदन कुमार मिश्र ने भारत वंदना प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. श्रीनिकेत मिश्र ने किया तथा कुलसचिव काद़र नव़ाज ख़ान ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम में  प्रो.अनिल कुमार राय, प्रो. चतुर्भुज नाथ तिवारी, प्रो. कृपाशंकर चौबे, डॉ. रामानुज अस्‍थाना, डॉ. हरीश हुनगुंद, डॉ. अशोक नाथ त्रिपाठी, डॉ. अनवर अहमद सिद्दीकी, डॉ. रामप्रकाश यादव, डॉ. मुन्‍ना लाल गुप्ता, डॉ. सुनील कुमार,  डॉ. धनजी प्रसाद, डॉ. मीरा निचळे आदि सहित अध्यापक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में आभासी माध्यम से तथा प्रत्यक्ष: उपस्थित रहे।

 

 

 

 

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