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दुनिया में मंडरा रहा बड़ा संकट, यूएन चीफ ने किया आगाह, दुनिया 'परमाणु विध्वंस' से महज एक कदम दूर

 


न्यूयॉर्क (छत्तीसगढ़ दर्पण)। एक तरफ रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध ने दुनिया को टेंशन में डाल रखा है। वहीं, दूसरी चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। दुनिया का अधिकांश देश परमाणु संपन्न होना चाहता है। ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु मसले को लेकर विवाद रहता है। वहीं, नॉर्थ कोरिया अमेरिका और साउथ कोरिया पर परमाणु हमला करने की चेतावनी दे रहा है। ऐसे समय संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुतारेस (UN chief Antonio Guterres) ने परमाणु विध्वंस को लेकर बड़ी बात कह दी है।

दुनिया में परमाणु खतरा बढ़ रहा है
संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुतारेस ने दुनिया को अगाह किया है कि हम सब परमाणु विध्वंस से महज एक कदम की दूर पर खड़े हैं। उन्होंने खासतौर से यूक्रेन में युद्ध और पश्चिम एशिया तथा एशिया में संघर्षों में परमाणु हथियारों के खतरों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया तथा एशिया ''विनाश की ओर बढ़'' रहे हैं।

फिर परमाणु युद्ध हुआ तो क्या होगा
बता दें कि, विश्व में बढ़ रहे परमाणु खतरा को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, जर्मनी, संयुक्त राष्ट्र के परमाणु प्रमुख और अन्य वक्ताओं ने अपनी-अपनी बात रखी।वहीं, गुतारेस ने परमाणु अप्रसार संधि की समीक्षा करने के लिए महीने भर चलने वाले सम्मेलन में भाग ले रहे कई मंत्रियों, अधिकारियों और राजनयिकों से कहा कि यह बैठक हमारी सामूहिक शांति एवं सुरक्षा के लिए एक अहम वक्त में हो रही है।

दुनिया को परमाणु मुक्त करना होगा
एंतोनियो गुतारेस ने कहा कि, यह सम्मेलन बड़े आपदाओं को रोकने तथा मानवता को परमाणु मुक्त दुनिया की ओर अग्रसर करने की दिशा में अहम रोल अदा कर सकता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका, जापान चिंतित
वहीं, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा कि उत्तर कोरिया अपना सातवां परमाणु परीक्षण करने की तैयारी कर रहा है, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाने में असमर्थ रहा है। उन्होंने इस दौरान रूस, यूक्रेन के बीच जारी जंग से उत्पन्न विकट परिस्थितियों का जिक्र किया। वहीं, जापानी प्रधान मंत्री फुमियो किशिदा ने भी दुनिया में बढ़ते परमाणु संकट का जिक्र करते हुए रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग को लेकर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि, मॉस्को ने यूक्रेन में जिन परिस्थितियों को पैदा किया है, उससे पूरी दुनिया चिंतित है।
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गोटाबाया के श्रीलंका लौटने से बढ़ सकते हैं तनाव, राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे बोले, लौटने का यह सही समय नहीं

 

कोलंबो (छत्तीसगढ़ दर्पण)। श्रीलंका दिवालिया हो चुका है। इस स्थिति में गोटाबाया राजपक्षे ने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए देश छोड़कर भाग गए। इसके बाद वहां के हालात और भी ज्यादा बिगड़ गए। महंगाई और सरकार की लचर आर्थिक नीतियों से परेशान जनता ने राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास पर धावा बोल (sri lanka political crisis) दिया था। इसके बाद गोटाबाया राजपक्षे ने तुरंत राष्ट्रपति के सरकारी आवास को छोड़कर निकल गए। इसके बाद वे मालदीव से होते हुए सिंगापुर चले गए। हालांकि, वहां भी उनके हालात सही नजर नहीं आ रहे हैं। सिंगापुर में भी उनकी गिरफ्तारी की मांग की जा रही है। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने कहा है कि, श्रीलंका के हालात को देखते हुए पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के लिए देश वापस लौटने का सही समय नहीं है। उनके लौटने से देश में तनाव बढ़ सकता है।

गोटाबाया की परेशानी नहीं हो रही है कम
गोटाबाया राजपक्षे की परेशानी अब कम होने के बजाए बढ़ते ही जा रहे हैं। गोटाबाया के खिलाफ सिंगापुर में एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई है। बता दें कि, श्रीलंका में कथित दुर्व्यवहारों का दस्तावेजीकरण करने वाले एक अधिकार समूह ने सिंगापुर के अटॉर्नी-जनरल के पास एक आपराधिक शिकायत दर्ज की है, जिसमें दक्षिण एशियाई राष्ट्र के दशकों पुराने गृहयुद्ध में उनकी भूमिका के लिए पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे की गिरफ्तारी की मांग की गई है।

यह गोटाबाया के लिए लौटने का सही समय नहीं है
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका के नए राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने कहा कि पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के देश लौटने का यह सही समय नहीं है क्योंकि इससे राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है। विक्रमसिंघे ने जर्नल के साथ एक साक्षात्कार में कहा, "मुझे नहीं लगता कि यह उनके लौटने का समय है।" "मेरे पास उनके जल्द लौटने के कोई संकेत नहीं दिख रहे है।'बता दें कि, गोटाबाया राजपक्षे 13 जुलाई को देश छोड़कर भाग गए थे। इसके एक सप्ताह बाद रानिल विक्रमसिंघे संसद में हुए चुनाव में जीत हासिल कर देश के राष्ट्रपति बन गए।

देश को मुसीबत में डालकर देश छोड़कर भाग गए थे गोटाबाया राजपक्षे
श्रीलंका को राजनीतिक संकट में डालकर गोटाबाया राजपक्षे 13 जुलाई को श्रीलंका से सिंगापुर भाग गए थे। सिंगापुर जाने से पहले वे मालदीव भी रुके थे, हालांकि, वहां मचे जबर्दस्त हंगामें के बाद गोटाबाया वहां से सीधे सिंगापुर चले गए। वहां भी वे चैन से नहीं बैठ पा रहे हैं। सिंगापुर की सरकार ने कहा है कि, गोटाबाया को उन्होंने शरण नहीं दिया है, वे निजी यात्रा पर देश के भ्रमण पर आए हुए हैं।

श्रीलंका के राष्ट्रपति बने रानिल विक्रमसिंघे
वहीं, देश की स्थिति को सुधारने के लिए श्रीलंका में राष्ट्रपति चुनाव कराए गए। रानिल विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं, गोटबाया सरकार के करीबी और गृह मंत्री रहे दिनेश गुणेवर्दना को श्रीलंका के नए प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई गई। अब देखना है कि राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे और दिनेश गुणेवर्दना देश की आर्थिक स्थिति को पटरी पर ला पाने में सफल होते हैं अथवा नहीं। बाकी, देश की जनता आर्थिक संकट और घोर महंगाई से जूझ ही रही है।

कैसे बदलेंगे देश के हालात
अब इन सबके बीच गोटाबाया के श्रीलंका वापस लौटने की बात हो रही है तो राष्ट्रपति ने साफ कर दिया है कि यह समय उनके (गोटाबाया राजपक्षे) लिए देश लौटने का नहीं है, क्योंकि यहां के राजनीतिक हालात अभी ठीक नहीं है।
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रूसी हमले में यूक्रेन के बड़े अनाज निर्यातक की मौत, हाल ही में हुआ था खाद्यान्न समझौता


कीव (छत्तीसगढ़ दर्पण)। यूक्रेन में जंग (Russia-Ukraine War) के खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं। जंग ने 'यूरोप की रोटी की टोकरी'कहे जाने वाले यूक्रेन जंग में तबाह और बर्बाद हो चुका है। जंग के बीच खबर मिली है कि, यूक्रेन में रूसी हमले के दौरान अनाज के बड़े व्यवसायी ओलेक्सी वडातुर्स्की और उनकी पत्नी की मौत हो गई है। बता दें कि, वडातुर्स्की यूक्रेन की सबसे बड़ी अनाज उत्पादक और निर्यात कंपनियों में से एक मायकोलाइव शहर में निबुलोन के संस्थापक थे। बता दें कि, यूक्रेन में रूस के हमले बढ़ गए हैं। 24 फरवरी को रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था। इस महायुद्ध ने दुनियाभर में खाद्य सुरक्षा पर गहरा असर डाला है। बता दें कि दुनिया भर में उत्पन्न खाद्य संकट से निपटने को लेकर पिछले दिनों यूक्रेन से अनाज निर्यात पर दोनों देशों के बीच सहमति बनी थी। जिसके बाद यूक्रेन से अनाज निर्यात की तैयारियां भी शुरू हो गईं हैं, लेकिन इसी बीच रूस ने यूक्रेन के दक्षिणी शहर माइकोलाइव पर भारी बमबारी की खबर मिली, जिसमें देश के बड़े अनाज निर्यातक की मौत हो गई।

अनाज के सबसे बड़े व्यापारी की जंग में मौत
रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग के बीच पुतिन की सेना ने यूक्रेन के दक्षिणी शहर माइकोलाइव पर भारी बमबारी की। । माइकोलाइव के गवर्नर विटाली किम (Vitaliy Kim) ने बताया कि, रविवार को हुई इस बमबारी में यूक्रेन के सबसे बड़े अनाज उत्पादकों व निर्यातकों में से एक ओलक्सी वडातुर्स्की और उनकी पत्नी रायसा की मौत हो गई।

यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की ने ओलेक्सी की मौत पर दुख जताया
यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की ने ओलेक्सी वडातुर्स्की की मौत पर गहरा दुख जताया है। उन्होंने अपने एक बयान में कहा कि, अनाज के इतने बड़े व्यवसायी की हमले में मौत पूरे देश के लिए एक बड़ी क्षति है। उन्होंने अपने 50 साल के अपने करियर में यूक्रेन के विकास और देश के कृषि और जहाज निर्माण उद्योगों के विकास में अपना अमूल्य योगदान दिया था। अनाज निर्यातक ओलेक्सी वडातुर्स्की की कंपनी निबुलोन का मुख्यालय माइकोलाइव में स्थित है। ओलेक्सी वडातुर्स्की की कंपनी निबुलोन गेंहू, जौं और मक्का का उत्पादन और निर्यात में यूक्रेन में सबसे आगे है।

रूस ने हमलवे तेज किए
निबुलोन कंपनी अपने जहाजों और शिपयार्ड से अनाज का निर्यात करती है। जेलेंस्की ने ओलेक्सी वडातुर्स्की की मौत को यूक्रेन के लिए बड़ा नुकसान बताया है। वहीं, जंग के बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति ने पूर्वी डोनेस्क क्षेत्र को खाली करने का आदेश जारी कर दिया है।

बड़े-बड़े इमारत ध्वस्त हो गए
वहीं माइकोलाइव के मेयर ऑलेक्ज़ेंडर सेनकेविच ने बताया कि, क्षेत्र में रूसी हमले तेज हो गए हैं, बम के धमाकों ने ओलेक्सी वडातुर्स्की के घर को धवस्त कर दिया है। उन्होंने जंग के बारे में आगे बताया कि, रूसी हमले में घरों की खिड़कियां, मजबूत दीवारें तबाह और बर्बाद हो गई हैं। उन्होंने कहा कि, संभवत: रूस का इस शहर पर जबरदस्त हमला है।
 
यूएन ने चेताया
बता दें कि, रूस ने यूक्रेन के कई महत्वपूर्ण शहरों पर अपना कब्जा जमा लिया है। लाखों लोग पलायन कर चुके हैं और हजारों की संख्या में लोग अब तक मारे जा चुके है। वहीं संयुक्त राष्ट्र ने इससे पहले इस जंग को लेकर उत्पन्न होने वाले खाद्य संकट से दुनिया को अवगत कराया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर जंग को रोका नहीं गया तो यूक्रेन पर अनाज के लिए निर्भर रहने वाले देशों में गंभीर खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो जाएगा।
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युगांडा-कांगो सीमा पर संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों ने की गोलीबारी, 2 की मौत, 15 घायल

तस्वीर- प्रतीकात्मक (पीटीआई) 

 किंशासा (छत्तीसगढ़ दर्पण)। संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों ने रविवार सुबह कांगो और युगांडा की सीमा पर गोलीबारी की और दो लोगों की हत्या कर दी। इस घटना में कम से कम 15 लोग घायल भी हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस पर निराशा व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता ने ट्वीट कर कहा, 'एंटोनियो गुटेरेस कांगो और युगांडा की सीमा पर कासिंडी में रविवार सुबह हुई एक गंभीर घटना से नाराज हैं, जिसमें मोनुस्को के सैन्य कर्मियों ने अपने गृह देश में छुट्टी से कांगो लौटते समय गोलियां चलाईं।'

सोशल मीडिया पर साझा किए गए इस घटना के वीडियो में एक व्यक्ति पुलिस और दूसरा सेना की वर्दी पहने कासिंदी में संयुक्त राष्ट्र के काफिले की ओर बढ़ता दिख रहा है। इसके बाद दोनों एक बंद बैरियर के पीछे रुकते दिखाई देते हैं। इसके बाद दोनों ने कुछ बातचीत की और फिर उन्होंने बैरियर खोलने से पहले ही फायरिंग कर दी। वे लोगों के तितर-बितर होने या छिपने के दौरान गाड़ी चलाते हुए दिखाई दिए। 

यूएन ने घटना की निंदा की 
देश में हुई इस घटना के बाद कांगो सरकार के प्रवक्ता पैट्रिक मुयाया ने एक बयान में कहा कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य 'इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की कड़ी निंदा और निंदा करता है जिसमें दो हमवतन मारे गए और 15 अन्य घायल हो गए।' वहीं, कांगो में संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष प्रतिनिधि बिंतौ कीता ने कहा कि जांच शुरू हो गई है और संदिग्ध अपराधियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। बिंतौ कीता ने कहा इन सैनिकों के मूल देश से संपर्क किया गया है ताकि कानूनी कार्रवाई तत्काल शुरू की जा सके। हालांकि उन्होंने देश का नाम नहीं लिया है। 

शांतिसैनिकों के खिलाफ बढ़ा गुस्सा 
कांगो में 120 से अधिक सशस्त्र समूह सक्रिय हैं। संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार 1999 में इस क्षेत्र में एक पर्यवेक्षक मिशन तैनात किया था। 2010 में, यह शांति मिशन मोनुस्को बन गया। पिछले हफ्ते, संयुक्त राष्ट्र के प्रस्थान की मांग को लेकर पूर्वी डीआरसी के कई शहरों में घातक प्रदर्शन हुए। इसमें तीन शांति सैनिकों सहित कुल 19 लोग मारे गए थे। कांगो में इस धारणा से गुस्सा बढ़ गया है कि MONUSCO सशस्त्र समूहों द्वारा हमलों को रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास करने में विफल रहा है।
 
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चीन की चेतावनी के बावजूद नैंसी पेलोसी का एशिया दौरा शुरू...

 गोपनीय रखा गया ताइवान जाना

वाशिंगटन/नई दिल्ली (छत्तीसगढ़ दर्पण)। अमेरिका के House of Representative की स्‍पीकर नैंसी पेलोसी का आज से एशिया का दौरा शुरू हो रहा है। उनका ये दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब चीन ने इसको लेकर अमेरिका को बेहद कड़े शब्‍दों में चेतावनी दी है। अपने इस पहले एशिया दौरे पर नैंसी सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जापान और मलेशिया जाएंगी। हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इस बात का खुलासा नहीं किया है कि नैंसी इस दौरे में ताइवान जाएंगी या नहीं। माना जा रहा है कि उनका ताइवान के दौरे को सुरक्षा के लिहाज से बेहद गोपनीय रखा गया है। इसकी वजह चीन की धमकी है। चीन ने एक दिन पहले ही कहा था कि यदि नैंसी का विमान अमेरिकी फाइटर जेट के साथ ताइवान में प्रवेश करता है तो वो उन्‍हें मार गिराएगा।

चीन की धमकी के मद्देनजर दौरे का फुलप्रूफ प्‍लान
हालांकि, चीन की इस तरह की धमकी की अपेक्षा अमेरिका को पहले से ही थी। यही वजह थी कि अमेरिका इसके लिए पहले से ही फुलप्रूफ प्‍लान बना रहा था। यदि नैंसी अपने इस दौरे में ताइवान जाती हैं तो ये अमेरिका और चीन के लिए भविष्‍य में तनाव को और बढ़ाने में काफी अहम साबित होगा। इस तनाव को कम करना दोनों ही देशों के लिए लगभग नामुमकिन होगा।

सिंगापुर से शुरू होगा नैंसी का एशिया का दौरा
एशिया के दौरे पर सबसे पहले नैंसी सिंगापुर जाएंगी। वहां पर उनकी मुलाकात सिंगापुर के पीएम और राष्‍ट्रपति से होगी। इसके बाद वो मलेशिया, दक्षिण कोरिया और जापान जाएंगी। उनके साथ जाने वाले अन्‍य सदस्‍यों में विदेश मामलों की कमेटी के अध्‍यक्ष ग्रिगरी मिक्‍स और परमानेंट सिलेक्‍ट कमेटी आन इंटेलिजेंस और आर्म्‍ड सर्विस कमेटी के सदस्‍य भी हैं। आपको बता दें कि नैंसी पेलोसी अमेरिका की तीसरे नंबर की ताकतवर नेता हैं। 1997 में आखिरी बार अमेरिकी सीनेट का स्‍पीकर इस तरह से एशिया दौरे पर आया था।

अमेरिका के विदेश मंत्री का बयान
चीन के खतरे और उसकी धमकी को देखते हुए अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने दो दिन पहले ही कहा था कि ताइवान को लेकर उनके और चीन के बीच में 40 वर्षों से अधिक समय से तनाव है। इसके बाद दोनों ही देश विवादों को भुलाकर शांति और स्थिरता के लिए आगे आए हैं।

चीन को बर्दाश्‍त नहीं ताइवान के मामले में दखल
बता दें कि अमेरिका चीन की वन चाइना पालिसी को मानता है। वन चाइना पालिसी के तहत ताइवान को इस तरह की तवज्‍जो देना चीन कभी बर्दाश्‍त नहीं कर सकता है।  चीन ताइवान को अपना ही हिस्‍सा मानता है। यही वजह है कि ताइवान के साथ किसी भी देश के आधिकारिक तौर पर कूटनीतिक संबंध नहीं हैं। न ही संयुक्‍त राष्‍ट्र से ताइवान को एक आजाद राष्‍ट्र के रूप में मान्‍यता मिली हुई है। ओलंपिक गेम्‍स में भी उसके खिलाड़ी चीन के उम्‍मीदवार के तौर पर शामिल होते हैं।

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अचानक बहुत ही तेजी से घूमने लगी है पृथ्वी, 29 जुलाई को सारा रिकॉर्ड टूटा,वैज्ञानिक बता रहे हैं ये संभावित कारण

 नई दिल्ली (छत्तीसगढ़ दर्पण)। पृथ्वी ने अपनी रफ्तार बढ़ा दी है। 29 जुलाई को इसने 24 घंटे की साइकिल को भी पूरा नहीं किया और अपनी धुरी पर उससे पहले ही पूरी घूम गई। वैज्ञानिकों के लिए यह शोध का विषय है कि आखिर पृथ्वी की गति बढ़ने की वजह क्या है। इसके साथ वैज्ञानिक इसके होने वाले प्रभावों पर भी माथापच्ची करना शुरू कर चुके हैं। सुनने में यह जरूर रोचक घटना लग रही है, लेकिन, यह कई तरह की चिंताओं की वजह भी बन सकता है और वैज्ञानिक उसका समाधान निकालने में भी जुट गए हैं।

29 जुलाई को 24 घंटे से पहले अपनी धुरी पर घूम गई पृथ्वी 
29 जुलाई यानी शुक्रवार को पृथ्वी ने अपने अक्ष पर घूमने का सारा रिकॉर्ड तोड़ दिया। पृथ्वी के घूर्णन की गति का मानक समय 24 घंटे है। यानी पूरे 24 घंटे में पृथ्वी अपनी धुरी पर पूरा एक चक्कर काटती है। लेकिन, उस दिन इसने यह चक्कर 1.59 मिली सेकंड पहले ही पूरा कर लिया। दि इंडिपेंडेंट के मुताबिक हाल के समय में जीवन से भरे इस ग्रह ने अपनी रफ्तार बढ़ा दी है। इंडिपेंडेंट के अनुसार अगर पृथ्वी के घूर्णन की दर बढ़ती रही तो इससे निगेटिव लीप सेकंड की शुरुआत होगी, जिससे पृथ्वी जितने समय में सूर्य का चक्कर लगाती है, उसके दर को अटॉमिक क्लॉक से सुसंगत बनाए रखने में चुनौती खड़ी हो सकती है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक संभावित कारण क्या हैं ? 
वैसे तो पृथ्वी ने इतनी तेजी से चक्कर काटना किस वजह से शुरू किया है, इसका पुख्ता कारण अभी तक अज्ञात है। लेकिन, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह इसके कोर की आंतरिक या बाहरी परतों, महासागरों, ज्वार या यहां तक कि जलवायु में परिवर्तन से जुड़ी प्रक्रियाओं की वजह से हो सकता है। लेकिन, यह सिर्फ अनुमान है। हालांकि, कई शोधकर्ता वैज्ञानिकों के इस नजरिए से भी आगे बढ़कर सोचने को मजबूर हुए हैं।

'चैंडलर वोबेल' भी हो सकता है कारण 
कुछ शोधकर्ताओं को लगता है कि इसका कारण पृथ्वी के भौगोलिक ध्रुवों की सतह की गति से जुड़ा हो सकता है, जिसे 'चैंडलर वोबेल' के नाम से जाना जाता है। लिओनिड जोटोव, क्रिश्चियन बिजओउआर्ड और निकोले सिदोरेंकोव जैसे वैज्ञानिकों के मुताबिक सामान्य शब्दों में यह ऐसा ही लगता है, जैसे एक इंसान किसी लट्टू की गति को तेज होते या कम होते देखता है। 'चैंडलर वोबेल' के कारणों का अभी तक पता नहीं लग सका है, जो कि 14 महीने की अवधि के साथ पृथ्वी के घूर्णन के अक्ष के अंडाकार दोलन को कहा जाता है।

50 साल के छोटे दिनों के चरण की शुरुआत ? 
1960 से जबसे इसे रिकॉर्ड किया जा रहा है, 2020 में पृथ्वी ने सबसे छोटा महीना देखा था। उस साल 19 जुलाई को सबसे छोटी अवधि का घूर्णन दर्ज किया गया था। यह 24 घंटे के मानक समय से 1.47 मिली सेकंड छोटा था। लेकिन, अगले साल यानी 2021 में पृथ्वी की तेज गति से घूमने की स्पीड जारी रही, लेकिन इसने कोई भी रिकॉर्ड नहीं तोड़ा। हालांकि, इंटरेस्टिंग इंजीनियरिंग (आईई) के अनुसार, 50 साल के छोटे दिनों का चरण अभी शुरू हो रहा हो सकता है।

विशेषज्ञों की बढ़ी चिंता 
हालांकि, एक्सपर्ट की चिंता ये भी है कि निगेटिव लीप सेकंड से स्मार्टफोन, कंप्यूटर और बाकी कम्युनिकेशन सिस्टम के लिए संभावित तौर पर भ्रमित करने वाली स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि, रिपोर्ट में एक मेटा ब्लॉग के हवाले से यह भी कहा गया है कि लीप सेकंड 'खास करके वैज्ञानिकों और खगोलविदों को लाभ दे सकता है' लेकिन, यह एक 'जोखिम भरा तरीका है जो अच्छे से ज्यादा नुकसान करता है।' यह इसलिए कि घड़ी 00:00:00 . पर रीसेट होने से पहले 23:59:59 से 23:59:60 तक बढ़ती है। इस तरह के टाइम जंप से प्रोग्राम क्रैश हो सकते हैं और डेटा करप्ट हो सकता है।

दुनिया की घड़ियों को कौन करता है कंट्रोल ? 
मेटा ने यह भी कहा है कि अगर निगेटिव लीप सेकंड किया जाता है, तो घड़ी 23:59:58 से 00:00:00 पर बदल जाएगी और इसका टाइमर और शेड्यूलर पर निर्भर सॉफ्टवेयर पर 'विध्वंसकारी प्रभाव' हो सकता है। इंटरेस्टिंग इंजीनियरिंग के मुताबिक इसके समाधान के लिए इंटरनेशनल टाइम कीपर्स को एक निगेटिव लीप सेकंड जोड़ने की आवश्यकता पड़ सकती है- एक 'ड्रॉप सेकंड' की। गौरतलब है कि कोऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम (UTC),वह प्राथमिक समय मानक है, जिसके आधार पर दुनिया घड़ियों और समय को नियंत्रित करती है, उसे पहले ही 27 बार एक लीप सेकंड के साथ अपडेट किया जा चुका है।



 
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फिलीपींस को कुख्यात मार्कोस से मुक्त कराने वाले पूर्व राष्ट्रपति फिदेल रामोस का निधन, कोरोना से थे पीड़ित

 मनीला (छत्तीसगढ़ दर्पण)। फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल वाल्डेज रामोस का रविवार रविवार को निधन हो गया। वह 94 वर्ष के थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वह कोरोना संक्रमित हो गए थे जिसके बाद उनका इलाज मकाती मेडिकल सेंटर में चल रहा था। इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। फिदेल रामोस के परिवार में पत्नी अमेलिता मिंग रामोस और चार बच्चे हैं।

फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने एक बयान में दुख जताते हुए कहा कि यह बहुत दुखद है कि पूर्व राष्ट्रपति फिदेल वी रामोस का निधन हो गया है। एक सैन्य अधिकारी और देश के प्रमुख दोनों के रूप में हमारे देश में महान परिवर्तनों में उनकी भागीदारी इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी। उन्होंने कहा कि वे हमारे लिए एक बेहतर विरासत छोड़ गए हैं। पूर्व राष्ट्रपति के परिजनों के प्रति सांत्वना व्यक्त करते हुए मार्कोस जूनियर ने कहा कि 'हम उनके परिवार, दोस्तों और सहयोगियों के साथ गहरा शोक व्यक्त करते हैं, हम उन्हें अपनी प्रार्थनाओं में याद रखेंगे।'

कोरिया और वियतनाम युद्ध में लिया था हिस्सा 
FVR के नाम से मशहूर रामोस ने वेस्ट पॉइंट पर यूएस मिलिट्री एकेडमी में पढ़ाई की थी औऱ 1950 के दशक में एक प्लाटून लीडर के रूप में कोरियाई जंग में लड़ाई लड़ी। उन्होंने 1960 के दशक के अंत में वियतनाम में फिलीपीन सिविल एक्शन ग्रुप के नेता के रूप में कार्य किया। राष्ट्रपति बनने से पहले फिदेल रामोस ने तत्कालीन राष्ट्रपति कोराज़ोन एक्विनो की सरकार में फिलीपींस के सशस्त्र बलों के चीफ-ऑफ-स्टाफ के रूप में भी कार्य किया था। इसके अलावा वे रक्षा सचिव भी रहे।

फिलीपींस के विकास में बड़ा योगदान 
रामोस 1992 से 1998 तक फिलीपींस गणराज्य के 12 वें राष्ट्रपति रहे थे। रामोस ने परिवहन और संचार क्षेत्रों में एकाधिकार को तोड़ा। कांग्रेस द्वारा दी गई विशेष शक्तियों के माध्यम से उन्होंने बदहाल बिजली व्यवस्था को पटरी पर लाने का काम किया। उनके कार्यकाल के दौरान फिलीपींस की अर्थव्यवस्था में वृद्धि हुई और गरीबी दर में तेजी से गिरावट आय़ी। उन्हें देश में नए सिरे से निवेशकों के विश्वास के पीछे प्रेरक शक्ति कहा जाता था। रामोस ने अपने शासनकाल में दक्षिणपंथी, वामपंथी और इस्लामी विद्रोहियों से लड़ाई लड़ी। रामोस एक मल्टी-टास्किंग एथलेटिक लीडर थे। जब वह सैन्य प्रमुख थे तो वह अपनी गेंद के पीछे दौड़ते हुए एक ही समय में गोल्फ और जॉग खेलते थे। हालांकि मार्कोस शासन के दौरान मार्शल लॉ लागू करने के लिए उनकी हमेशा आलोचना की जाती है।

मार्कोस से फिलीपींस को दिलाया छुटकारा
मार्शल लॉ के दौरान सैनिकों ने बेकसूर जनता को गिरफ्तार किया, महिलाओं का बलात्‍कार किया और उन्‍हें प्रताड़‍ित किया। अमेनेस्‍टी इंटरनैशनल के मुताबिक मार्कोस के शासन में 70000 लोगों को जेल भेजा गया, 34000 लोगों को प्रताड़‍ित किया गया और 3240 लोगों की हत्‍या हुई। मार्कोस की सरकार से अलग होने के बाद रामोस फिलीपींस में कई लोगों के नायक बन गए। रामोस ने एक राष्ट्रीय पुलिस बल का नेतृत्व किया और कुख्यात मार्कोस के शासन का पतन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
 
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बाढ़ का कहर : पाकिस्तान के इन प्रांतों में जानमाल का नुकसान, मृतकों की संख्या में बढ़ोतरी

 इस्लामाबाद/नई दिल्ली (छत्तीसगढ़ दर्पण)। पाकिस्तान के कई राज्य इन दिनों बाढ़ की समस्या से जूझ रहे हैं। पाकिस्तान में बाढ़ का सबसे ज्यादा असर बलूचिस्तान और सिंध प्रांत में देखने को मिला है। यहां हो रही भारी बारिश के कारण बाढ़ की स्थिति भी भयावह बनती जा रही है। मौसम विभाग की मानें तो बलूचिस्तान में इस साल अप्रत्याशित रूप से भारी बारिश हुई है। एक स्थानीय मीडिया ने पाकिस्तान के आपदा प्रबंधन अधिकारियों के हवाले से बताया कि पिछले 24 घंटों में एक परिवार के नौ लोग बाढ़ में बह गए। डान की खबर के मुताबिक मृतकों में सात बच्चे और एक महिला शामिल हैं।

खैबर पख्तूनख्वा में बाढ़ ने ली कई लोगों की जान
इसके अलावा पीडीएमए द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा में बाढ़ व एक मकान की छत गिरने से कम से कम 10 लोगों की मौत हो गई और 17 घायल हो गए हैं। साथ ही पिछले 36 घंटों में बाढ़ में लगभग 100 घर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं, जिससे लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, पाकिस्तान की सरकार ने भारी बारिश को देखते हुए बलूचिस्तान प्रांत में धारा 144 लागू कर दी है।

बलूचिस्तान प्रांत में धारा 144 लागू
बलूचिस्तान के मुख्य सचिव अब्दुल अजीज उकाली ने कहा, 'प्रांत में धारा 144 लागू कर दी गई है और नागरिकों को 10 दिनों तक अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी गई है'। उन्होंने कहा कि एक जून से अब तक बारिश ने 124 लोगों की जान ले ली है और सूबे में 10,000 घरों को नुकसान पहुंचा है। बाढ़ से लगभग 565 किमी सड़कें और 197,930 एकड़ कृषि भूमि क्षतिग्रस्त हो गई, जबकि 712 पशुधन भी मारे गए हैं।

बाढ़ की चपेट में आने से डूबे सिंध प्रांत के 50 गांव

बलूचिस्तान से अचानक आई बाढ़ के बाद पाकिस्तान के सिंध प्रांत में भी बाढ़ का कहर जारी है। जानकारी के अनुसार, सिंध प्रांत में 50 से अधिक गांव जलमग्न हो गए। सूत्रों के अनुसार, बलूचिस्तान में मूसलाधार बारिश और अचानक आई बाढ़ के कारण पानी की दूसरी धारा निकटवर्ती कंबार-शाहदादकोट जिले और दादू जिले के कछो के पहाड़ी क्षेत्र में प्रवेश कर गया है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में अधिक नुकसान हुआ।

बाढ़ प्रभावित क्षेत्र छोड़ने को मजबूर हुए लोग
स्थानीय सूत्रों ने कहा कि प्रभावित इलाकों के लोग अपनी जान बचाने के लिए पहाड़ियों और सुरक्षात्मक बांधों में शरण लेने को मजबूर हैं। साथ ही बाढ़ प्रभावित गांव में 70 साल की एक बुजुर्ग महिला की चिकित्सा सहायता न मिलने पर स्वास्थ्य की स्थिति के कारण मृत्यु हो गई है। पाकिस्तान के आपदा प्रबंधन अधिकारियों ने शनिवार को कहा कि भारी बारिश और बाढ़ में 19 और लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों अन्य बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में फंसे हुए हैं। पाकिस्तान मौसम विज्ञान विभाग (पीएमडी) ने अगले 24 घंटों के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में और बारिश और गरज के साथ बौछारें पड़ने की भविष्यवाणी जारी की है।

 

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सच में वो इजरायल की 'दादी' थीं, 1971 में दिया था भारत का साथ, नहीं भूलेंगे हम वो बात....

 नई दिल्ली/तेल अवीव (छत्तीसगढ़ दर्पण)। बात सन 1971 की है, एक तरफ भारत-पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ा हुआ था। वहीं, भारत से हजारों किलोमीटर दूर इजरायल में कोई इस युद्ध पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए था। हम बात कर रहे हैं, इजरायल की प्रथम महिला प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर ( Israel, the country's first female Prime Minister Golda Meyer) के बारे में। 1971 की जंग की बात हो और इजरायल का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता है। वैसे भी आज 'अंतरराष्ट्रीय फ्रेंडशिप डे' है (International Friendship Day)।

इजरायल की दादी ने दिया भारत का साथ
भारत एक अकेला इजरायल का ऐसा दोस्त है, जो एक दूसरे के सुख-दुख के साथी हैं। भारत के इजरायल के साथ-साथ रूस, सऊदी अरब के साथ भी घनिष्ठ संबंध हैं। रूस हमेशा से भारत का अच्छा दोस्त रहा है। जब भारत पाकिस्तान के बीच जंग चल रहा था और अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ का साथ देते हुए भारत को झुकाने की कोशिश की थी, ऐसे वक्त में रूस ने भारत का साथ दिया। मॉस्को की सैन्य ताकत के आगे अमेरिका ने अपने घुटने टेक दिए थे। यह है भारत और रूस की दोस्ती। हालांकि, आज हम इजरायल से दोस्ती की बात कर रहे हैं, तो इस पर हम अपना फोकस रखते हैं।

भारत-इजरायल की दोस्ती एक मिसाल है
यूक्रेन की राजधानी कीव में जन्मी गोल्डा मेयर को इजरायल की 'दादी' कहा जाता था। कहा जाता है कि, गोल्डा बिना फिल्टर की सिगरेट पीती थीं। इसको लेकर इजरायल के प्रथम प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियों उन्हें मंत्रिमंडल की अकेली पुरुष कहकर संबोधित करते थे।

पीएम गोल्डा मेयर ने दोस्ती की रखी नींव
गोल्डा मेयर को भारत-इजरायल दोस्ती की नींव रखने के लिए जाना जाता है। भारत जब जंग की आग में झुलस रहा था तो ऐसे वक्त में 'इजरायल की दादी' ने भारत का समर्थन किया था। कहा जाता है कि, उन्होंने ही भारत और इजरायल के बीच दोस्ती को आगे बढ़ाया था। भारत और पाकिस्तान के बीच जंग (1971) के समय इजरायल के साथ हमारे अच्छे संबंध नहीं थे। उस वक्त इजरायल का सबसे करीबी दोस्त अमेरिका इस जंग में पाकिस्तान का साथ दिया था। उस समय गोल्डा मेयर ने भारत को साथ देने का मन बना लिया था। उन्होंने तय किया कि किसी भी परिस्थिति में वे भारत का साथ देंगी।

जंग में दिया भारत का साथ
कहा जाता है कि, तत्कालीन इजरायली पीएम गोल्डा मेयर ने भारत को इस जंग में गुप्त तरीके से सैन्य सहायता भेजी थी। इस बात का जिक्र अमेरिका के पत्रकार गैरी जे बास ने अपनी किताब ब्लड टेलिग्राम में किया है। किताब में जिक्र बातों के मुताबिक, गोल्डा ने इजरायली हथियार विक्रेता श्लोमो जबलुदोविक्ज के माध्यम से भारत को कुछ हथियार और मोर्टार गुपचुप तरीके से भिजवाए थे। बता दें कि, भारत-पाकिस्तान के बीच हुई जंग में रूस और इजरायल ने भारत का साथ दिया था।

छोड़ेंगे न हम तेरा साथ .......
आज रूस जब यूक्रेन में जंग को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों से अलग-थलग पड़ गया है, ऐसे वक्त में भारत रूस का साथ नहीं छोड़ रहा है। अमेरिका समेत कई देश भारत को रूस के खिलाफ जाने के लिए उकसाता रहता है लेकिन भारत अपनी बात मजबूती के साथ अंतरराष्ट्रीय पटल पर रखते हुए रूस का साथ नहीं छोड़ रहा है।
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दुनिया का सबसे छोटा धनकुबेर, 6 साल की एज में प्राइवेट जेट, मैंशन और लैम्बॉर्गिनी जैसी लग्जरी कारों का मालिक !

 नाइजीरिया (छत्तीसगढ़ दर्पण)। करोड़ों-अरबों रुपये का मालिक होने का ख्वाब तो न जाने कितने लोग देखते हैं, लेकिन आज के दौर में कम लोग ही ऐसे होते हैं, जिनके पास अरबों रुपये की संपत्ति हो। संक्षेप में कहें तो धनकुबेर हो। इन्हीं कुछ चुनिंदा लोगों में एक हैं मोम्फा। महज 6 साल की एज में मोम्फा प्राइवेट जेट, मैंशन और लैम्बॉर्गिनी जैसी लग्जरी कारों के मालिक हैं। दावा किया जा रहा है कि ये दुनिया का सबसे छोटा धनकुबेर है। इतनी कम उम्र में करोड़ों-अरबों रुपये का मालिक बने मोम्फा की कहानी किसी परीकथा से कम नहीं। पढ़ें-

मोम्फा के पास अपनी हवेली 
मोम्फा जूनियर - दुनिया के सबसे कम उम्र के अरबपति होने का दावा करते हैं। यूं तो छह साल की उम्र खेलने-कूदने और मस्ती करने की होती है, लेकिन इतनी छोटी सी एज में मोम्फा के पास अपनी हवेली है। हवेली के मालिक होने के अलावा मोम्फा के पास प्राइवेट जेट भी है, जिससे वे नाइजीरिया के बाहर का सफर करते हैं।

इंस्टाग्राम पर 25,000 फोलोअर्स 
खेलने-कूदने की एज में प्राइवेट जेट से दुनिया की यात्रा करने वाले इस बच्चे के बारे में दावा है कि मोम्फा जूनियर दुनिया का सबसे कम उम्र का अरबपति हैं। इनका असली नाम मोहम्मद अवल मुस्तफा (Muhammed Awal Mustapha) है। इंस्टाग्राम पर 25,000 फोलोअर्स के साथ मोम्फा अपनी धमाकेदार जीवन शैली शेयर करते रहते हैं।

करोड़ों की कीमत वाली कार 
इंस्टाग्राम की एक पोस्ट में मोम्फा क्रीम कलर की Bentley Flying Spur के बोनट पर बैठे देखे जा सकते हैं। इस पोस्ट की कैप्शन में लिखा गया है कि उनके पिता ने उनके लिए पहली कार खरीदी थी। प्री-टीन इन्फ्लुएंसर मोम्फा के वाले घर के बाहर एक पीले रंग की फेरारी सहित चार और लग्जरी कारें खड़ी दिखाई देती हैं।

लग्जरी कारों का बेड़ा 
एक दूसरी पोस्ट में मोम्फा लाल लेम्बॉर्गिनी एवेंटाडोर की बोनट पर बैठेने के अलावा डिजाइनर कपड़े पहने हुए हैं। उन्होंने पोस्ट कैप्शन में लिखा: "मुझे जन्मदिन मुबारक हो।" दुबई में उनके विशाल लग्जरी घरों में से एक के बाहर पीले रंग की फेरारी सहित अधिक और गाड़ियां भी देखी जा सकती हैं।

लाइफस्टाइल के लिए सुर्खियों में मोम्फा 
मोम्फा अरबपति नाइजीरियाई इंटरनेट सेलिब्रिटी इस्माइलिया मुस्तफा का बेटा है, जो मोम्फा नाम से लोकप्रिय जाता है। मोम्फा सीनियर भी अपने बेटे की तरह ही महंगी चीजों के शौकीन हैं। अपने असाधारण खर्च और शानदार लाइफस्टाइल के लिए सुर्खियों में मोम्फा और उनकी फैमिली नाइजीरिया के लागोस और यूएई में अपने घरों के बीच घूमती है। एक मिलियन से अधिक इंस्टाग्राम फॉलोअर्स के साथ मोम्फा अक्सर फोटो शेयर करते हैं।

छठे जन्मदिन पर मोम्फा ने खरीदी हवेली 
मोम्फा को सात सितारा होटलों में, हाइपरकार की ड्राइविंग सीट पर देखा जा सकता है। 2019 में अपने छठे जन्मदिन पर मोम्फा जूनियर ने अपनी पहली हवेली खरीदी। उन्होंने उस समय कथित तौर पर लिखा था: "अपने घर का मालिक होना अब तक की सबसे अच्छी भावनाओं में से एक है। इसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता है, इसे पैसे में नहीं मापा जा सकता है।

दो बच्चों के पिता मोम्फा सीनियर 
"घर का मालिक होना एक ऐसी भावना है जो आश्वस्त करता है कि तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद आपके पास जाने के लिए एक जगह है...। एक ऐसी जगह जो आपको कभी जज नहीं करेगी और हमेशा आपको खुली बाहों से आमंत्रित करेगी... द सन की रिपोर्ट के मुताबिक दो बच्चों के पिता मोम्फा सीनियर अपनी बीवी को कैश मैडम कहते हैं।

 
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अमेरिका में आ गई आर्थिक मंदी, भारत में निर्यात अभी भी कमजोर, अर्थव्यवस्था कैसे बचाएगी मोदी सरकार?

 नई दिल्ली (छत्तीसगढ़ दर्पण)। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने विश्व ने अपने जुलाई अपडेट में वर्ल्ड इकोनॉमिक ऑउटलुक में चालू वित्त वर्ष में भारत के विकास दर का अनुमान 80 बेसिक प्वाइंट घटाकर 7.4 प्रतिशत कर दिया है। आईएमएफ का अपटेडेट विकास दर का अनुमान काफी हद तक आधिकारिक अनुमानों के करीब और वास्तविक मालूम होता है। वहीं, आईएमएफ ने अगले साल के लिए भारत की अर्थव्यवस्था के 6.1 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान जताया है। आईएमएफ के मुताबिक, भारत के विकास दर पर विदेशी घटनाओं और वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों का पड़ा है। हालांकि, इसके बाद भी आईएमएफ का अनुमान भारत सरकार के लिए काफी राहत देने वाली है।

वैश्विक विकास दर पर प्रभाव 
आईएमएफ के अनुमानों के मुताबिक, साल 2022 में वैश्विक विकास दर का अनुमान 3.2 प्रतिशत है और आईएमएफ रिपोर्ट ने आने वाली वैश्विक मंदी (नकारात्मक विकास की लगातार दो तिमाहियों के रूप में परिभाषित) के बारे में चिंताओं को चिह्नित किया है। यह अमेरिका और अन्य उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के लिए चिंता का विषय हो सकता है। हालांकि भारत में मंदी की संभावना फिलहाल कम नजर आ रही है। वहीं, पिछले हफ्ते ब्लूमबर्ग की लेटेस्ट रिपोर्ट में सर्वे के आधार पर कहा गया है कि, कई एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था पर मंदी का खतरा बढ़ रहा है और उच्च कीमतें केंद्रीय बैंकों को अपनी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की गति को तेज करने के लिए मजबूर कर रही हैं और दर्जन भर देश भीषण आर्थिक संकट में फंस सकते हैं। लेकिन, ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, भारत पर आर्थिक मंदी का खतरा शून्य प्रतिशत है, जबकि श्रीलंका और अमेरिका भी खतरे की लिस्ट में शामिल हैं।

अमेरिका पर आर्थिक मंदी का कितना खतरा? 
आईएमएफ की रिपोर्ट ने 2022 में अमेरिकी विकास दर के अनुमान में बड़ा संशोधन किया है और अमेरिका के विकास दर का अनुमान घटाकर सिर्फ 2.3 प्रतिशत कर दिया है, जो अप्रैल की रिपोर्ट के मुकाबले, 1.4 प्रतिशत कम है। साल 2023 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सिर्फ 1 प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है, जो अमेरिका के लिए नकारात्मका बात है। यह वृद्धि 2023 की दूसरी छमाही में काफी हद तक कमजोर होने की उम्मीद है। वहीं, 2023 की चौथी तिमाही में अर्थव्यवस्था के केवल 0.6 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। अमेरिका में मंदी की आशंका को लेकर मिले-जुले संकेत मिल रहे हैं। जनवरी से मार्च की तिमाही में, अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने संकुचन आने की संभावना जताई गई है। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ अटलांटा के GDPNow पूर्वानुमान मॉडल के लेटेस्ट आंकड़ों में जो अनुमान लगाया गया है, उसके मुताबिक, अप्रैल से जून तिमाही के लिए GDP -1.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इन आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में मंदी की शुरुआत हो चुकी है। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ अटलांटा का विश्लेषण वास्तविक जीडीपी विकास का एक चालू अनुमान प्रदान करता है, जो कि जीडीपी के आधिकारिक अनुमान के जारी होने तक लंबित है, जो एक अंतराल के साथ आता है।

उपभोक्ता बाजार में निराशा 
आर्थिक मंदी को टालने के लिए दुनियाभर के केन्द्रीय बैंक्स ने डिमांड घटाने के लिए अपने ब्याज दरों को बढ़ाना शुरू कर दिया और अमेरिका की केन्द्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने भी लगातार ब्याज दर बढ़ाए हैं, लेकिन इसका नतीजा ये हुआ, कि डिमांड में तेजी से कमी आनी शुरू हो गई और उपभोक्ता बाजार निराशावादी हो गये हैं। मिशिगन यूनिवर्सिटी का इंडेक्स ऑफ कंज्यूमर सेंटिमेंट, अब तक के सबसे निचले स्तर पर है। वहीं, एक साल बाद की औसत मुद्रास्फीति 5.2 प्रतिशत रहने की उम्मीद है, जो कि 2 प्रतिशत के मुद्रास्फीति लक्ष्य से काफी ज्यादा है। हालांकि, कॉरपोरेट बिक्री और रोजगार संख्या जैसे अन्य महत्वपूर्ण संकेतक हैं, जो अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर नहीं दिखाते हैं। विभिन्न संकेतकों के आधार पर, ब्लूमबर्ग ने अर्थशास्त्रियों के विश्लेषण के आधार पर जो सर्वे रिपोर्ट तैयार किया है, उसमें अमेरिका में आर्थिक मंदी आने की संभावना 38 प्रतिशत है।

आईएमएफ की रिपोर्ट में वैश्विक महंगाई का हाल? 
आईएमएफ की रिपोर्ट में इस साल वैश्विक मुद्रास्फीति को 8.3 प्रतिशत के शिखर पर पहुंचाने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि, अगले साल इसके 6 फीसदी से नीचे रहने का अनुमान है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति इस साल 6.6 फीसदी से घटकर अगले साल 3.3 फीसदी रहने का अनुमान है। अगले साल तेल की कीमतों में 12 फीसदी की गिरावट का अनुमान लगाया गया है। यदि वास्तविक मुद्रास्फीति ग्राफ इन अनुमानों के करीब हो जाता है, तो ब्याज दरों में बढ़ोतरी की गति में कमी देखी जा सकती है, हालांकि इसकी संभावना तत्काल नहीं है, लेकिन आने वाली कुछ तिमाहियों में ऐसा हो सकता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव? 
ब्लूमबर्ग ने अर्थशास्त्रियों के अनुमानों के आधार पर जो विश्लेषण किया है, उसमें भारत के लिए बहुत बड़ी राहत की बात है और भारत में आर्थिक मंदी आने की संभावना शून्य प्रतिशत जताई गई है। भारत में मुद्रास्फीति और संभावित विकास मंदी, मुख्य रूप से वैश्विक झटके के कारण हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालने वाली बाहरी बाधाओं में नरमी देखी जा सकती है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने महंगाई पर काबू पाने के लिए अपनी ताजा बैठक में ब्याज दरों में 75 बेसिक प्वाइंट्स की बढ़ोतरी की है। वहीं, यूरोपीय सेंट्रल बैंक के बेंचमार्क दर को 50 आधार अंकों तक बढ़ाने के फैसले से अमेरिकी डॉलर सूचकांक में कुछ नरमी आई है। तेज विदेशी बहिर्वाह के उलटने और कच्चे तेल और कमोडिटी की कीमतों में सुधार ने रुपये को 80 प्रति डॉलर के स्तर को छूने के बाद वापसी करने में मदद की है।

भारत में आर्थिक मंदी आने की संभावना कम 
हाई फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज मंदी की संभावना कम है। एक जुलाई को खत्म हुए हफ्ते में क्रेडिट ग्रोथ में 14.4 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। और एक महत्वपूर्ण बात ये है, कि उद्योगों को दिए गये बैंक कर्ज में मई 2022 में 8.7 प्रतिशत तक की तेजी आई है। जबकि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को ऋण ने सरकार की आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना द्वारा संचालित मजबूत वृद्धि दिखाई है, हाल के दो महीनों में देखा गया है कि, बड़े उद्योगों को भी ऋण मिल रहा है। इसके साथ ही भारत की कैपिसिटी उपयोग में वृद्धि, इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास खर्च में आई तेजी और प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए भारत सरकार की 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव स्कीम' में भी तेजी आई है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से शुभसंकेत हैं। वहीं, सर्विस सेक्टर से जो ज्यादातर संकेत मिल रहे हैं, उसमें भी पिछले दो महीनों में उल्लेखनीय सुधार दिखाया गया है। हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि, उपभोक्ता आर्थिक संभावनाओं के बारे में अधिक आशावादी हो गए हैं। उपभोक्ता भावनाओं का सूचकांक (आईसीएस) पिछले चार महीनों में सुस्त वृद्धि के बाद जुलाई में ठीक होने के लिए तैयार है। वहीं, तेल की कीमतों में गिरावट का अनुमान भारत में महंगाई कम होने की दिशा में एक अच्छी खबर है, जो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि की गति को प्रभावित कर सकता है।

फिर भी विकास दर होगा प्रभावित 
हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था ने लचीलापन दिखाया है, लेकिन, इसके बाद भी यह वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में संभावित मंदी से सुरक्षित नहीं रह सकती है। 2021-22 में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज करने के बाद आने वाले महीनों में निर्यात में नरमी देखी जा सकती है। विशेष रूप से, अमेरिका में मंदी का असर भारत के आईटी सेवाओं के निर्यात पर पड़ेगा। हालांकि ऑफशोर क्लाइंट्स से ऑर्डर फ्लो अभी भी मजबूत है, स्टैगफ्लेशन की चिंताओं के कारण आईटी फर्मों के प्रॉफिटेबिलिटी मार्जिन में कमी देखी जा रही है। लिहाजा, नीतिगत फोकस मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिरीकरण, निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता और मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण से लाभ को मजबूत करने पर फोकस होना चाहिए।
 
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चीन का जासूसी जहाज पहुंचेगा श्रीलंका? भारत की सख्ती के बाद कोलंबो से आई प्रतिक्रिया

 कोलंबो (छत्तीसगढ़ दर्पण)। श्रीलंका में जारी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच खबर है कि चीन अपने जासूसी जहाज यूआन वांग 5 के साथ हंबनटोटा बंदरगाह पर दस्तक देने जा रहा है। चीन के इस ऐलान के बाद भारत पूरी तरह से सतर्क हो गया है। हालांकि, श्रीलंका ने इसे अफवाह करार दिया है 

चीन का जासूसी जहाज करेगा घुसपैठ! 
चीन अपने जासूसी जहाज यूआन वांग5 के साथ श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर दस्तक देने जा रहा है। चीन के इस ऐलान के बाद भारत अब पूरी तरह से सतर्क हो गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह जासूसी जहाज 11 अगस्‍त को आ रहा है, जिसका मकसद हिंद महासागर क्षेत्र में शोध कार्य और सैटलाइट कंट्रोल करना है। प्रस्तावित यात्रा के अनुसार यह जहाज 17 अगस्त को हंबनटोटा से लौट जाएगा। अब भारत इस बात की जांच कर रहा है कि इस जासूसी जहाज के प्रस्तावित यात्रा में श्रीलंका के तरफ से किस प्रकार कि मदद दी जा रही है।

भारत सतर्क 
श्रीलंका के रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को उन रिपोर्टों का खंडन किया कि अंतरिक्ष और उपग्रह ट्रैकिंग में शामिल एक चीनी अनुसंधान पोत इस साल अगस्त में हंबनटोटा बंदरगाह में प्रवेश करेगा, यहां तक ​​​​कि भारत ने एक "स्पष्ट संदेश" भेजा कि वह चीनी जहाज की हर एक गतिविधियों की सावधानीपूर्वक निगरानी कर रहा है।
 
 
क्या कहती है BRISL की वेबसाइट 
रक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कोलंबो में 'द हिंदू' को बताया, "हमारे पास हंबनटोटा बंदरगाह पर इस तरह के जहाज के बुलाए जाने की कोई खबर नहीं है। जानकारी के मुताबिक, चीन के जासूसी जहाज यूआन वांग 5 के हंबनटोटा बंदरगाह पर आने की बात बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव श्रीलंका (BRISL) कही थी। बता दें कि, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव श्रीलंका एक कोलंबो आधारित संगठन है जो चीन की महत्वाकांक्षी कनेक्टिविटी परियोजना का अध्ययन कर रहा है। अपनी वेबसाइट पर, BRISL ने कहा, कि युआन वांग 5, जो 13 जुलाई को जियानगिन के चीनी बंदरगाह से रवाना हुआ था और वह ताइवान से होकर गुजरा है। वेबसाइट के मुताबिक, अब युआन वांग 5 पूर्वी चीन सागर में है और 11-17 अगस्त से श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर ठहरने की उम्मीद है।

श्रीलंका के तरफ से आया बयान 
श्रीलंका में चीन के बेल्‍ट एंड रोड प्रॉजेक्‍ट के निदेशक वाई रानाराजा ने कहा कि यह चीनी जहाज हिंद महासागर के पश्चिमोत्‍तर हिस्‍से में सैटलाइट कंट्रोल और शोध निगरानी करेगा। यह कोई सैन्य पोत नहीं है। पोत के पाठयक्रम का विवरण किसी भी को देखने के लिए ऑनलाइन उपलब्ध है। BRISL की रिपोर्ट में कहा गया है कि, युआन वांग5 की हंबनटोटा पोर्ट की यात्रा से श्रीलंका और क्षेत्रीय विकासशील देशों को अंतरिक्ष कार्यक्रमों को सीखने और विकसित करने का उत्कृष्ट अवसर होगा।

चीन घुसपैठ करने की कोशिश करता रहता है 
हालांकि, इन सबके बावजूद भारत चीन की चाल को समझते हुए पहले ही सतर्क हो चुका है। बता दें कि, साल 2014 के बाद यह ऐसा पहली बार है जब इस तरह का चीनी जासूसी जहाज श्रीलंका के दौरे पर आ रहा है इससे पहले साल 2014 में एक चीनी पनडुब्‍बी हंबनटोटा बंदरगाह पहुंची थी, जिस पर भारत ने आपत्ति जताई थी।
 
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'बहुत ज्यादा चिंता है, लेकिन...' विश्व बैंक ने श्रीलंका को कर्ज देने से किया इनकार, सारी उम्मीदें खत्म!

 कोलंबो (छत्तीसगढ़ दर्पण)। विश्व बैंक ने श्रीलंका की स्थिति को चिंताजनक मानते हुए भी लोन देने से साफ इनकार कर दिया है। गुरुवार को विश्व बैंक ने अपर्याप्त मैक्रोइकॉनॉमिक पॉलिसी फ्रेमवर्क का हवाला देते हुए कहा कि, मौजूदा आर्थिक संकट के बीच श्रीलंका को कोई नई वित्तीय मदद देने की उसकी कोई योजना नहीं है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान ने कहा कि, वह श्रीलंका के लोगों पर गंभीर संकट के प्रभाव के बारे में 'गहराई से चिंतित' है।

विश्व बैंक ने अपने बयान में क्या कहा? 
विश्व बैंक ने श्रीलंका को लेकर जो बयान जारी किया है, उसमें कहा गया है कि, 2 करोड़ 20 लाख की आबादी वाले द्वीप राष्ट्र को संरचनात्मक सुधारों को अपनाने की आवश्यकता है, जो आर्थिक स्थिरीकरण पर ध्यान केंद्रित करते हैं और इसकी स्थिति के मूल कारणों से निपटते हैं, जिसकी वजह से श्रीलंका के पास विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो गया है और जिसने श्रीलंका में भोजन की गंभीर कमी को उत्पन्न कर दिया है। विश्व बैंक ने माना है कि, श्रीलंका में पेट्रोल और ईंधन की सख्त कमी होने के साथ साथ दवाओं की भी भारी किल्लत हो गई है है। विश्व बैंक ने कहा कि, "विश्व बैंक समूह गंभीर आर्थिक स्थिति और श्रीलंका के लोगों पर इसके प्रभाव के बारे में गहराई से चिंतित है ...लेकिन, जब तक पर्याप्त व्यापक आर्थिक नीति ढांचा नहीं बनता है, विश्व बैंक श्रीलंका को नए वित्तपोषण की पेशकश करने की योजना नहीं बनाएगा''।
 
'जो लोन दिया है, उसी में काम चलाओ'
 
'जो लोन दिया है, उसी में काम चलाओ' 
विश्व बैंक ने कहा है कि, श्रीलंका को जो मौजूदा कर्ज मिला हुआ है, उसी में जरूरी संसाधनों, दवा, रसोई गैस, उर्वरक, बच्चों के लिए दूध पाउडर और कमजोर परिवारों के लिए आर्थिक मदद जैसी व्यवस्था करनी चाहिए और कमियों को दूर करना चाहिए। विश्व बैंक ने ये बी कहा है कि, वह श्रीलंका की सरकार के साथ निष्पक्ष वितरण सुनिश्चित करने के लिए नियंत्रण और प्रत्ययी निरीक्षण स्थापित करने के लिए मिलकर काम कर रहा था। आपको बता दें कि, श्रीलंका में पिछले कई महीनों से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, क्योंकि पूर्व राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के नेतृत्व वाली सरकार वित्तीय संकट का सामना करने में विफल रही है।

देश में राजनीतिक उठापटक 
देश के नए राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे, जो राष्ट्रपति बनने से पहले देश के प्रधान मंत्री थे, उन्होंने 13 जुलाई से देश में आपातकाल लागू किया हुआ है और विरोध प्रदर्शन को उन्होंने सैन्य शक्ति से कुचलने की कोशिश की है। वहीं, पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्ष श्रीलंका से फरार होने के बाद मालदीव के रास्ते सिंगापुर फरार हो चुके हैं। इससे पहले जून में, गोटाबाया राजपक्षे ने कहा था कि, विश्व बैंक 17 मौजूदा परियोजनाओं का पुनर्गठन करेगा और वित्तपोषण ऋण पर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ बातचीत के बाद और सहायता का पालन करेगा।

श्रीलंका ने चीन से फिर मांगी मदद 
वहीं, जो श्रीलंका चीन की वजह से आर्थिक संकट में फंसा हुआ है, उसने एक बार फिर से चीन से ही आर्थिक मदद मांगी है। श्रीलंका के बीजिंग दूतावास में न्यूज एजेंसी रॉयटर्स को दिए एक इंटरव्यू में पालिता कोहोना ने कहा कि कोलंबो चाहता है कि, चीन अपनी कंपनियों को अधिक श्रीलंकाई काली चाय, नीलम, मसाले और वस्त्र खरीदने के लिए कहे। इसके साथ ही पालिता कोहोना ने कम्यूनिस्ट सरकार से चीनी आयात नियमों को अधिक पारदर्शी बनाने की भी अपील की है। श्रीलंकाई राजदूत ने कहा कि बीजिंग कोलंबो और हंबनटोटा में चीन समर्थित विशाल बंदरगाह परियोजनाओं में और निवेश करके भी मदद कर सकता है। कोहोना ने कहा कि कोविड-19 महामारी के कारण प्रमुख चीनी निवेश योजनाएं अमल में नहीं आई थीं। इसके अलावा, श्रीलंका अधिक चीनी पर्यटकों की चाहत रखता है। 2018 में श्रीलंका आने वाले पर्यटकों की संख्या 265,000 थी, जो कि 2019 में आत्मघाती हमलों और कोरोना महामारी के बाद लगभग नगण्य हो गई है।

चीन के चाटुकार माने जाते हैं विक्रमसिंघे 
कोहोना ने कहा कि श्रीलंका के नए राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे की व्यापार, निवेश और पर्यटन सहित अन्य मुद्दों पर सहयोग पर चर्चा करने के लिए चीन की यात्रा करने की योजना है। राजपक्षे परिवार चीन का करीबी हुआ करता था लेकिन श्रीलंका के वर्तमान राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे भी चीन के लिए अजनबी नहीं हैं। रॉयटर्स के पत्रकार, दूतावास के जिस कमरे में उनका इंटरव्यू कर रहे हैं वहां चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी हाथ मिलाते हुए एक तस्वीर है। यह तस्वीर 2016 में प्रधानमंत्री के रूप में बीजिंग का दौरा किया तब की है।
 

 

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दुनिया के सबसे महंगे घर में रुके प्रिंस सलमान, जिसका मर्डर करवाया! उसके भाई ने बनवाया था घर

 पेरिस (छत्तीसगढ़ दर्पण)। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान फ्रांस की आधिकारिक यात्रा पर हैं। खबर के मुताबिक इस दौरान उन्होंने दुनिया के सबसे महंगे घर में 'नाइट स्टे' किया। इसके बाद से दुनिया भर में लौवेसिएन्स में मौजूद शेटॉ लुई XIV हवेली के चर्चे हो रहे हैं। बता दें कि, शैटॉ लुई XIV हवेली का संबंध सऊदी प्रिंस के कट्टर आलोचक रहे पत्रकार जमाल खशोगी के परिवार से है। जमाल खशोगी की इस्तांबुल में सऊदी दूतावास के अंदर हत्या कर दी गई थी। तब अमेरिका समेत कई देशों ने दावा किया था कि खशोगी की हत्या का आदेश सीधे मोहम्मद बिन सलमान ने दिया था।


दुनिया के सबसे महंगे शैटॉ लुई XIV हवेली 
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान फ्रांस की आधिकारिक यात्रा को दौरान दुनिया के सबसे महंगे शैटॉ लुई XIV हवेली में विश्राम किया। विलासिता से भरपूर इस हवेली के चर्चे फिर से दुनिया भर में हो रही है। शैटॉ लुई XIV हवेली के मालिक के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। 7,000 वर्ग मीटर में फैली इस हवेली को 2015 में एक अज्ञात खरीदार ने 275 मिलियन यूरो में खरीदा था। इसी कारण फॉर्च्यून पत्रिका ने इसे दुनिया का सबसे महंगा घर करार दिया था।
 
क्या सऊदी क्राउन प्रिंस इस हवेली के मालिक हैं? 
2017 में द न्यूयॉर्क टाइम्स ने दावा किया था कि इस हवेली के मालिक सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि उन्होंने फर्जी कंपनियों के जरिए इस घर को खरीदा था। मगर, इस रिपोर्ट में किए गए दावे की न तो सऊदी अरब ने और ना ही फ्रांस ने अभी तक कोई पुष्टि की है।

दुनिया की सबसे महंगी हवेली 
इस हवेली के पास में ही वर्साय पैलेस मौजूद है, जो फ्रांसीसी शाही परिवार का आधिकारिक निवास था, जिसे वर्तमान में म्यूजियम में बदल दिया गया है। इस हवले में विलासिता के सारे सामान मौजूद हैं। शैटॉ लुई XIV में एक नाइट क्लब, एक सोने की पत्ती वाला फव्वारा, एक सिनेमा घर भी बना हुआ है। इसके अलावा इस हवेली में पानी के नीचे एक कांच का कमरा भी है, जहां सफेद चमड़े से बना सोफा रखा हुआ है। अंदर जाने पर यह कमरा किसी एक्वेरियम की तरह नजर आता है।

शैटॉ लुई XIV हवेली का खशोगी कनेक्शन जानें 
शैटॉ लुई XIV हवेली का सीधा संबंध सऊदी प्रिंस के घोर आलोचक रहे पत्रकार जमाल खशोगी के परिवार से है। जानकारी के मुताबिक, जमाल खशोगी के चचेरे भाई इमाद खशोगी ने शैटॉ लुई XIV का निर्माण करवाया था। इमाद खशोगी फ्रांस में लग्जरी प्रापर्टी डेवलपमेंट बिजनेस चलाते हैं। बता दें कि, जमाल खशोगी की इस्तांबुल में सऊदी दूतावास के अंदर हत्या कर दी गई थी। उस समय अमेरिका समेत कई देशों ने दावा किया था कि खशोगी की हत्या का आदेश सीधे मोहम्मद बिन सलमान ने दिया था।

इसी हवेली में रुके थे प्रिंस सलमान 
बता दें कि, अब समाचार एजेंसी एएफपी ने फ्रांसीसी अधिकारियों के हवाले से बताया है कि मोहम्मद बिन सलमान गुरुवार को फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से मिलने से पहले इसी महंगे हवेली में रुके थे। इस हवेली के बाहरी गेट पर बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों,फ्रांसीसी पुलिस की गाड़ियों को देखा गया था।
 
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व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद पहली बार वाशिंगटन पहुंचे ट्रंप, झूठे चुनावी दावे दोहराए

 वाशिंगटन (छत्तीसगढ़ दर्पण)। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस को अलविदा कहने के बाद बाद पहली बार मंगलवार को वाशिंगटन लौटे और एक बार फिर अपने झूठे चुनावी दावों को दोहराया, जो अमेरिकी संसद भवन (कैपिटल हिल) में छह जनवरी को विद्रोह का कारण बने थे।

ट्रंप ने इस बात पर जोर दिया कि उनके 2020 का चुनाव जीतने के सभी सबूत मौजूद थे। उन्होंने कहा  वह चुनाव हमारे देश के लिए एक कलंक है। पूर्व राष्ट्रपति ने 2024 के चुनाव में अपनी उम्मीदवारी पेश करने का एक बार फिर संकेत दिया। उन्होंने कहा,  हमें शायद एक बार फिर करके दिखाना होगा।

व्हाइट हाउस के पूर्व अधिकारियों और कैबिनेट सदस्यों के एक समूह द्वारा आयोजित एक बैठक में लोगों की तालियों के बीच ट्रंप ने यह बयान दिया। ऐसा माना जा रहा है कि बैठक का मकसद ट्रंप के दोबारा चुनाव लड़ने के लिए एक एजेंडा तैयार करना था।

जो बाइडन के 20 जनवरी 2021 को अमेरिका के राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभालने और खुद के व्हाइट हाउस को अलविदा कहने के बाद पहली बाद पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप वाशिंगटन पहुंचे। पूर्व उप राष्ट्रपति माइक पेंस के भाषण के कुछ घंटे बाद ट्रंप ने अपनी बात रखी। पेंस को 2024 चुनाव में ट्रंप का संभावित प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा है।

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जॉनसन ने जेलेंस्की को चर्चिल पुरस्कार से सम्मानित किया

 लंदन (छत्तीसगढ़ दर्पण)। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने मंगलवार को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को ‘सर विन्सटन चर्चिल लीडरशिप अवार्ड’ से सम्मानित किया तथा संकट के समय में दोनों नेताओं की तुलना की। जेलेंस्की ने जॉनसन के लंदन कार्यालय में एक समारोह के दौरान वीडियो लिंक के जरिए पुरस्कार स्वीकार किया। इस कार्यक्रम में चर्चिल के परिवार के सदस्य, यूक्रेन के राजदूत वैदिम प्रिस्तेको और वे यूक्रेनी भी शामिल हुए, जिन्होंने ब्रिटिश सैनिकों से प्रशिक्षण लिया है।

जॉनसन ने यह याद किया कि जेलेंस्की ने कैसे 24 फरवरी को पुष्टि की थी कि रूस ने आक्रमण कर दिया है। उन्होंने कहा, सबसे बड़े संकट की घड़ी में आपने अपने तरीके से नेतृत्व की परीक्षा का सामना किया जैसे कि चर्चिल ने 1940 में किया था। जेलेंस्की ने जॉनसन और ब्रिटेन का उनके सहयोग के लिए आभार जताया।

उत्तर पूर्वी देश यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद जॉनसन पहले पश्चिमी नेता थे जो कीव गए थे। इस माह के शुरू में जॉनसन द्वारा कंजर्वेटिव पार्टी के नेता पद से इस्तीफा देने के बाद जेलेंस्की ने कहा था कि वह इस घटनाक्रम से दुखी हैं।

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ऋषि सुनक पर तिलमिलाया चीन का ग्लोबल टाइम्स, कहा- ब्रिटेन में क्या खेल चल रहा, सब पता है

 नई दिल्ली (छत्तीसगढ़ दर्पण)। ब्रिटेन में बोरिस जॉनसन के पद से इस्तीफा देने के बाद नए प्रधानमंत्री पद का चुनाव अपने अंतिम दौर में है। कंजर्वेटिव पार्टी के नेतृत्व के लिए बचे दो प्रत्याशी एक दूसरे के विरूद्ध जोर आजमाइश कर रहे हैं। ऋषि सुनक और लिज ट्रस दोनों ने ही इस बार के चुनाव में चीन के खिलाफ आक्रमक रूख अपनाया है। इसे लेकर चीन के सरकारी अखबार ने हैरानी जताई है। चीन के मुखपत्र कहे जाने वाले ग्लोबल टाइम्स ने दोनों ही दावेदारों पर इसे लेकर कड़ी टिप्पणी की है।

ऋषि के बयान से हैरान ग्लोबल टाइम्स
ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि लिज ट्रस पहले भी चीन को लेकर हमलावर रही हैं, ऐसे में उनका चीन विरोधी बयान हैरानी भरा नहीं है लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि आम तौर पर संतुलित नजर आने वाले सुनक ने अचानक चीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अब वह चीन को ब्रिटेन और वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बता रहे हैं। ये बेहद हैरान करने वाली बात है। यह चीन के लिए ही नहीं बल्कि उनका समर्थन करने वाले लोगों के लिए बेहद आश्चर्य का विषय है।
असफलता छुपाने के लिए दिखाते हैं चीन का डर
असफलता छुपाने के लिए दिखाते हैं चीन का डर
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में चीन के लिए नीति, नेताओं के परिवर्तन के साथ नाटकीय रूप से नहीं बदलती है। "चीन के खतरे" को बढ़ावा देने का कार्य उन अक्षम राजनेताओं के लिए सबसे अच्छे विकल्पों में से एक है जो अपने को छुपाने के लिए हैं। यह बात और है कि चुनावों में फेल हो चुके ये नेता अपनी फेल्योर छिपाने के लिए चीन से खतरे के मुद्दे को भुनाना शुरू करेंगे, जबकि उन्हें पता है कि उनके देश के आंतरिक मामलों से चीन का कोई भी लेना-देना नहीं है।
चीन से बैर रखने से ब्रिटेन को होगा नुकसान
चीन से बैर रखने से ब्रिटेन को होगा नुकसान
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि ये नेता स्पष्ट रूप से समझते हैं कि चीन के साथ संबंध अच्छे रखने से उन्हें कुछ हद तक आर्थिक दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। अगर ये चीन के साथ संबंध खराब करते हैं तो अंततः उनके देश की अर्थव्यवस्था को ही नुकसान होगा। लेकिन, चीन विरोधी माहौल तैयार करने से वहां के मतदाताओं को यकीन हो जाता है कि ब्रिटेन की आंतरिक समस्याओं के लिए चीन जिम्मेदार है। यह समझदारी, साहस का काम नहीं बल्कि बिल्कुल बेहूदा और आसान विकल्प है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि इस समय ब्रिटेन के राजनेताओं की टिप्पणियां चुनाव जीतने के लिए है, इसलिए चीन को इसे बहुत गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है, बस हमें देखना है कि वे चुनाव जीतकर क्या करते हैं।
आलोचनाओं के बाद बदले सुनक
आलोचनाओं के बाद बदले सुनक
ऋषि सनक और लिज़ ट्रस के टेलीविजन बहस की भी अखबार ने चर्चा की है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि पूर्व वित्त मंत्री सनक ने कहा कि चीन "इस सदी में ब्रिटेन और दुनिया की सुरक्षा और समृद्धि के लिए सबसे बड़ा खतरा" का प्रतिनिधित्व करता है। ग्लोबाल टाइम्स ने ऋषि सुनक पर विरोधियों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों पर भी लिखा है। अखबार लिखता है कि सुनक को उनके विरोधी, चीन पर नरम रूख रखने के लिए घेर रहे हैं। ट्रस के सहयोगियों के मुताबिक जब सनक जुलाई 2021 में वित्त मंत्री थे, उन्होंने कहा कि ब्रिटेन को चीन के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को मजबूत करना चाहिए। ऐसे में सुनक ने भी चीन के प्रति अपना सुर पूरी तरह से बदल लिया है।
 
चीन के विरोध में अँधे हुए नेता
चीन के विरोध में अँधे हुए नेता
ग्लोबल टाइम्स आगे लिखता है कि सनक चीन विरोध में इतने डूब गए हैं कि उन्होंने कहा है कि वह ब्रिटेन में कन्फ्यूशियस संस्थान की सभी 30 शाखाओं पर प्रतिबंध लगा देंगे। सुनक का तर्क है कि चीनी सरकार द्वारा शैक्षिक और सांस्कृतिक संगठन का उपयोग ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में सॉफ्ट पावर को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। उन्होंने यूके के तकनीकी स्टार्ट-अप को चीनी निवेश से बचाने के लिए नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के सख्त उपयोग और चीनी साइबर खतरों से निपटने के लिए एक नए "नाटो-शैली" अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन का भी वादा किया है।
गंभीर आर्थिक समस्या का सामना कर रहा ब्रिटेन
गंभीर आर्थिक समस्या का सामना कर रहा ब्रिटेन
ग्लोबल टाइम्स में चीनी विश्लेषकों ने कहा कि ब्रिटेन वर्तमान में गंभीर आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहा है, और अगर यह चीन के साथ अपने संबंधों को और खराब करता है और द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को प्रभावित करता है, तो निश्चित रूप से ब्रिटेन को और अधिक नुकसान होगा। इसलिए चुनाव के दौरान राजनेता जो कुछ भी वोट प्राप्त करना चाहते हैं, कह सकते हैं, लेकिन उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि चुने जाने के बाद उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं और अगर वे वास्तव में अपने वादों को पूरा करते हैं तो क्या होगा।

चुनाव जीतने का बहाना है चीन विरोधी प्रचार
चीन के रेनमिन विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय मामलों के संस्थान के निदेशक वांग यीवेई ने सोमवार को ग्लोबल टाइम्स को बताया कि पश्चिमी देशों में चुनावों के दौरान की गई टिप्पणियां इतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं। ग्लोबल टाइम्स लिखता है कि ब्रिटेन अब गंभीर आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहा है। बुधवार को गार्जियन के अनुसार, ब्रिटेन की मुद्रास्फीति दर 40 साल के उच्च स्तर 9.4 प्रतिशत पर पहुंच गई और अक्टूबर में 12 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। रेलवे में 40,000 से अधिक कर्मचारियों और एक दर्जन से अधिक ट्रेन कंपनियों द्वारा नियोजित हड़ताल अगले सप्ताह आगे बढ़ेगी और 1995 के बाद से अपनी तरह की यह पहली राष्ट्रीय हड़ताल होगी।

चीन से संबंध खराब करना नासमझी है
ग्लोबल टाइम्स में विश्लेषकों ने लिखा है कि इस तरह के संकटों का सामना करते हुए, ब्रिटेन के नए नेता को चीन-ब्रिटेन संबंधों को नुकसान पहुंचाने के लिए नासमझी नहीं करनी चाहिए। हालांकि, जहरीले राजनीतिक माहौल के कारण, ब्रिटेन के राजनेता चीन के साथ संबंधों को नुकसान पहुंचाने का अविवेकपूर्ण और आसान निर्णय लेना पसंद करते हैं, ताकि चरम रूढ़िवादी और लोकलुभावन ताकतों को खुश किया जा सके, बजाय इसके कि वे व्यावहारिक हों और चीन-ब्रिटेन संबंधों को विकसित करने के लिए सही विकल्प चुनें।
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यूक्रेन के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी ने ऐसा क्या कर दिया कि दुनिया भर में उनकी निंदा हो रही है?

 नई दिल्ली (छत्तीसगढ़ दर्पण)। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छठे महीने में पहुंच चुका है। अब तक इस जंग में हजारों लोग मारे जा चुके हैं। लाखों लोगों को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा है। अब तक पूरी दुनिया में यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की के अपने देश के लोगों के संग खड़े होने को लेकर, अपने सैनिकों का हौसला बढ़ाने को लेकर तारीफ होती रही है। लेकिन इस बीच यूक्रेनी राष्ट्रपति के एक फोटोशूट को लेकर उनकी आलोचना होने लगी है।

पत्नी के साथ नजर आ रहे जेलेंस्की
यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की के फोटोशूट को लेकर दुनियाभर में उनका मजाक बन रहा है। दरअसल रूस और यूक्रेन के बीच जेलेंस्की ने चर्चित पत्रिका वोग के लिए कुछ तस्वीरें खिंचवाई हैं। वोग की तस्वीरों में जेलेंस्की अपनी पत्नी ओलेना जेलेंस्का के साथ नजर आ रहे हैं। ये तस्वीरें वोग मैगजीन के ऑनलाइन एडीशन के लिए खिंचवाई गयी हैं।

फैशन पत्रिका के रूप में मशहूर है वोग
वोग पत्रिका को दुनियाभर में फैशन मैग्जीन के लिए जाना जाता है। इन फोटो में यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की अपनी पत्नी के साथ अलग-अलग पोज में दिख रहे हैं। इन तस्वीरों को ओलेना जेलेंस्की ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर भी शेयर किया है। ओलेना ने तस्वीर को शेयर करते हुए लिखा है कि वोग मैगजीन के कवर पर आना कई लोगों का सपना होता है। यह बेहद गौरव की बात है।

इंस्टाग्राम पर किया शेयर
ओलेना ने आगे लिखा है कि वे यूक्रेन की हर महिला को यहां देखना चाहेंगी जो इस समय रिफ्यूजी कैंपों में युद्ध की पीड़ा झेल रही हैं। उनके पास इस मैगजीन के कवर पर आने का अधिकार है। वे इसकी काबिलियत रखती हैं। तस्वीर के पब्लिक होने के बाद लोग इसकी आलोचना में जुट गए हैं।

आलोचना में जुटे लोग
एक यूजर ने लिखा है, "जब आपका देश युद्ध के बीच में है, लोग पीड़ित हैं, सैनिक मर रहे हैं लेकिन स्नैपचैट पीढ़ी को भी लुभाना महत्वपूर्ण है। वोग मैगजीन के फोटोशूट के लिए पोज देते हुए प्रेसिडेंट ज़ेलेंस्की और उनकी पत्नी। इतने तेजस्वी और बहादुर।"
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